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मैं भी कहाँ था छिपाने में माहिर

                
                                                         
                            हौले हौले होने लगा दर्द जाहिर
                                                                 
                            
मैं भी कहाँ था छिपाने में माहिर

यकीं पे कब तक रहता काबिज
छूट ही गई हाथ से डोर आखिर

अपने बन कर मिलते थे शातिर
कौन सहे किसी गैर की खातिर

फिर कुछ ऐसे लम्हे हुए नादिर
माथे पे मेरे लिख गए काफिर।
-मं शर्मा 
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52 मिनट पहले

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