आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

पिता जी की कमी

                
                                                         
                            पिता जी की कमी,
                                                                 
                            
निकालना आसान है,
तारीफ करना कठिन है।
हम किसी बात से परेशान थे,
पापा जी की अंतिम यात्रा से
लगभग छः-सात महीने पहले,
हम उनके कमरे में गए,
वह दीवार से टिके बैठे थे,
उनसे लिपट कर,
हम बहुत रोए,
पापा जी ने इशारे से पूछा,
हमने कहा कुछ नहीं,
रोने से दिल का,
गुबार निकल गया।
अब जब भी परेशान होते हैं,
आंसुओं को लिए फिरते हैं,
पर आंसू नहीं निकलते,
आंख तक आकर लौट जाते हैं।
आंख तक आकर लौट जाते हैं।।
-कुलदीप शुक्ला
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर