पिता जी की कमी,
निकालना आसान है,
तारीफ करना कठिन है।
हम किसी बात से परेशान थे,
पापा जी की अंतिम यात्रा से
लगभग छः-सात महीने पहले,
हम उनके कमरे में गए,
वह दीवार से टिके बैठे थे,
उनसे लिपट कर,
हम बहुत रोए,
पापा जी ने इशारे से पूछा,
हमने कहा कुछ नहीं,
रोने से दिल का,
गुबार निकल गया।
अब जब भी परेशान होते हैं,
आंसुओं को लिए फिरते हैं,
पर आंसू नहीं निकलते,
आंख तक आकर लौट जाते हैं।
आंख तक आकर लौट जाते हैं।।
-कुलदीप शुक्ला
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