बोले पपीहा कोयल गाये ,
बंद कली भँवरा मड़राये ,
और विरह अब सहा न जाये,
उस पर सावन आग लगाये ।
फूल खिले पत्ते लहरायें ,
रंग विरंगी तितली आ जायें,
हरी भरी धरती शरमाये ,
उस पर सावन आग लगाये ।
काली घटाये घिर घिर आयें ,
रिमझिम रिमझिम जल बरसायें ,
पुरवा ठण्डी पवन बहाये,
उस पर सावन आग लगाये ।
कड़के बिजुरिया मन घबराये ,
गरजे बादल सांसे थम जाये ,
हरपल किसी की याद सताये ,
उस पर सावन आग लगाये ।
ृ सौरभ दुबे " साहिल "
किशनी मैनपुरी ( यूपी )
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