आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

न बरसा गगन से, न बादल छँटे हैं।

                
                                                         
                            अधूरी प्रतीक्षा का यह मूक सावन,
                                                                 
                            
न बरसा गगन से, न बादल छँटे हैं।
अधूरी प्रतीक्षा का यह मूक सावन,
न बरसा गगन से, न बादल छँटे हैं।

हवाओं ने लाकर सँदेसा दिया है,
कि वसंत का लौट आना नियति है,
मगर पंख तोड़े हुए एक खग की,
व्यथा कह रही रूठ जाना नियति है,
इसी भंवर में घिर चुकी चेतना के,
न हिस्से जुड़े हैं, न टुकड़े बँटे हैं।
अधूरी प्रतीक्षा का यह मूक सावन,
न बरसा गगन से, न बादल छँटे हैं।

कहा था समय ने कि तुम भूल जाओ,
स्मृतियों की भस्म सौंप दो अब पवन को,
मगर यह विकल आत्मा चाहती है,
समर्पित करूँ मैं इसी एक क्षण को,
सुलगती हुई इन दिशाओं के भीतर,
न लौ जगमगाई, न साये हटे हैं।
अधूरी प्रतीक्षा का यह मूक सावन,
न बरसा गगन से, न बादल छँटे हैं।

भला कौन सी सीपियों ने सजल हो,
बिना प्यास के स्वाति-बूँदें सजाईं?
बिना चोट खाए तराशे गए कब,
कहाँ पत्थरों ने सजीवता पाई!
कठिन इस नियति के छलावे में आकर,
न फैले हैं सपने, न दुख सिमटे हैं।
अधूरी प्रतीक्षा का यह मूक सावन,
न बरसा गगन से, न बादल छँटे हैं।

किसे है ख़बर इस भ्रमित चेतना में,
कहाँ काल ने पाश अपना कसा है?
किसे ज्ञात है भस्म होती चिता में,
नया कौन सा प्रात इसमें बसा है!
अजब इस विधाता की माया के पन्ने,
न बांचे गए हैं, न खुद पलटे हैं।
अधूरी प्रतीक्षा का यह मूक सावन,
न बरसा गगन से, न बादल छँटे हैं।
-भानु शर्मा रंज
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
45 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर