बहाओ हृदय में सुधा-धार ऐसी
कि प्यासा कोई मन भटकता न डोले
जगाओ अगोचर वही दिव्य निष्ठा
कि अंतस स्वयं ही रहस्य सब खोले
बहाओ हृदय में सुधा-धार ऐसी
कि प्यासा कोई मन भटकता न डोले
अविद्या के जाले झरे दृष्टि से जब
खिले ब्रह्म-कमल नव पंखुड़ी से
कटे मोह-माया के बंधन निरंतर
जुड़े तार एकांत की बाँसुरी से
अनाहत उठे वह अनूठी सी झंकार
जहाँ शून्य भी नाद बनकर के बोले
बहाओ हृदय में सुधा-धार ऐसी
कि प्यासा कोई मन भटकता न डोले
भले बाह्य जग में हों तीर्थ अनेकों
मगर मोक्ष का पथ तो भीतर छिपा है
अमर चेतना का वो पावन भवन है
परम ज्योति का जो स्वयं इक दीया है
करो साधना की अगन इतनी पावन
कि खुद ईश आकर तेरा मौन तौले
बहाओ हृदय में सुधा-धार ऐसी
कि प्यासा कोई मन भटकता न डोले
मिटे द्वैत का भाव जब चेतना से
तभी पूर्णता का वो दर्शन मिलेगा
न होगा कोई भी पराया जगत में
हर एक श्वास में दिव्य-कण ही खिलेगा
बनो 'रंज' ऐसे विरक्त अनुरागी
गरल पी के भी मन अमृत ही घोले
बहाओ हृदय में सुधा-धार ऐसी
कि प्यासा कोई मन भटकता न डोले
-भानु शर्मा रंज
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