ज़िन्दगी का झूठा भरम दे दिया
क्यों मुझे तूने इतना ग़म दे दिया
जिसको पाला था मैंने बहुत प्यार से,
उसके हाथों ही मुझ पर सितम दे दिया !
जो हर पल रुलाये ऐसे जज़्बात न दे
कि मौत से बत्तर तू हालात न दे
किसी को भी मौला ऐसी औलाद न दे
किसी को भी...
मैं आँखों का कहती थी तारा तुझे
बुढ़ापे का कहती थी सहारा तुझे !
पकड़ कर उंगली चलना सिखाया था जिनकी,
उन्ही हाथों ने आज मारा मुझे !
कि मर्ज़ी है तेरी तू गम दे दे जितना
तू गम दे दे जितना, सितम दे दे जितना
पर बेटे की शक्ल में जल्लाद न दे
किसी को भी मौला ऐसी औलाद न दे
किसी को भी....
गरीबी में अपनी संभाला तुझे
मोहताज़ी में भी पाला तुझे
लगाकर के सीने से सुलाती थी तुझको,
और तूने ही घर से निकाला मुझे !
उजाड़े जो ममता की बगिया,
ऐसे माली के रूप में सय्याद न दे
किसी को भी मौला ऐसी औलाद न दे
किसी को भी...
- कलीम पालवी
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