शौक़-ए-विसाल-ए-यार में क्या-कुछ नहीं हुआ
इस एक-तरफ़ा प्यार में क्या-कुछ नहीं हुआ
पूरा जहान एक तरफ़ दूजी सम्त वो
इस कार-ए-दरकिनार में क्या-कुछ नहीं हुआ
दो नर्गिसी निगाहों ने मुझ पे चलाए तीर
इस इश्क़िया शिकार में क्या-कुछ नहीं हुआ
था मुझको ये वहम कि वो ख़्वाबों में आएगी
आमद के इंतिज़ार में क्या-कुछ नहीं हुआ
दो-चार दिन की ज़ीस्त थी दो-चार जी लिए
पर उम्र के गुज़ार में क्या-कुछ-नहीं हुआ
-जॉनी अहमद क़ैस
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X