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क्या-कुछ नहीं हुआ

                
                                                         
                            शौक़-ए-विसाल-ए-यार में क्या-कुछ नहीं हुआ
                                                                 
                            
इस एक-तरफ़ा प्यार में क्या-कुछ नहीं हुआ

पूरा जहान एक तरफ़ दूजी सम्त वो
इस कार-ए-दरकिनार में क्या-कुछ नहीं हुआ

दो नर्गिसी निगाहों ने मुझ पे चलाए तीर
इस इश्क़िया शिकार में क्या-कुछ नहीं हुआ

था मुझको ये वहम कि वो ख़्वाबों में आएगी
आमद के इंतिज़ार में क्या-कुछ नहीं हुआ

दो-चार दिन की ज़ीस्त थी दो-चार जी लिए
पर उम्र के गुज़ार में क्या-कुछ-नहीं हुआ

-जॉनी अहमद क़ैस
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10 घंटे पहले

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