सुबह का सूरज, उगा हुआ सवेरा
ग्रामीण जीवन और सुबह की सुंदरता पर कविता
सुबह का सूरज उगा, हुआ नया सवेरा,
चिड़िया चहकी, मुर्गा बोला, जाग उठा जग सारा।
उठो सभी, अब आँखें खोलो,
मेहनत से जीवन में खुशियों के रंग घोलो।
किसान चला खेतों की ओर
किसान जगा, हल लेकर खेतों में गया,
मेहनत करके फसल के बीज बोया।
धरती माँ की सेवा करता,
अच्छी फसल की आशा रखता।
बनिए ने दुकान खोली
बनिया जागा, दुकान सजाई,
ग्राहकों की राह निहारी।
कोई लेने आया सामान,
कोई करने लगा खरीदारी।
बालक चला विद्यालय
बालक उठा, बस्ता टाँगा,
स्कूल जाने का मन में उमंग जागा।
पढ़-लिखकर कुछ बनना है,
अपने सपनों को सच करना है।
गड़रिया चला पहाड़ों पर
उठा गड़रिया, भेड़-बकरियाँ लेकर,
पहाड़ों की राह चला हँसकर।
हरी-हरी घास चराने,
खुली हवा में उन्हें घुमाने।
बस्ती में छाई हलचल
उठी बस्ती, हुई हलचल,
हर घर में दिखने लगी चहल-पहल।
पानी भरने चलीं महिलाएँ,
काम पर निकले पुरुष, नई आशाएँ।
कोई चला अपने काम पर,
कोई निकला नए अरमान लेकर।
सवेरा लाया खुशियों का संसार
सुबह का सूरज उगा, जगमग हुआ सवेरा,
नई उमंगें लेकर आया दिन सुनहरा।
मेहनत, उम्मीद और खुशियों की बहार,
जाग उठा फिर से जीवन का संसार।
हर चेहरे पर नई मुस्कान,
हर दिल में कुछ करने का अरमान।
सुबह का सूरज संदेश सुनाता,
मेहनत करने वालों को आगे बढ़ना सिखाता।
-जगदीश कुमार बालोतरा
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