आवाजाही
बढ़ गई है
दुःख है कि
बात-चीत कम
हो गई है
एक नकली
आवाज़ में
असली आवाज़
दब गई है।
आर्थिक विसंगतियों
ने हंसी छीन
ली है
जद्दोजहत
है जीवन से
एलीट वर्ग
लाफिंग क्लब
जाने लगा है
करोड़ों के
बंडल पर
सोकर झुझलानें
लगा है
नींद की गोलियों
से रात विताने
लगा है।
सर्वहारा वर्ग
जैसे -तैसे
भोजन जुटाने
लगा है
लगा है कंकरीट
के जंगलों के
निर्माण मे
बालू , सिमेंट
मिलाने लगा है।
लघु मानव
है मानव समाज
का
थोड़ा सा
पाकर जीवन
चलाने लगा है।
यह भी
हंस सके
खिल खिलाकर
अच्छा त्योहार
मनाकर
वहअपनी
बात कह सके
इसके लिए
संदेह है लोकतंत्र पर
खतरा मंडराने लगा है।
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