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गीतिका

                
                                                         
                            भागते खोजते सभी कंचन
                                                                 
                            
बन गया नर्क देख अब जीवन

पास पैसा नहीं करें हम क्या
प्यार में हो रही सदा अनबन

साँवरे छोड़कर गए जब से
अब लुभाता नहीं सखी सावन

लेखनी नित चले लिखे झूमे
भाव बहते रहें सदा पावन

गूँजते ही रहें ठहाके यो
दूर जाकर बसे कहीं क्रंदन

क्षोभ आए नहीं कभी मन में
खिलखिलाता रहे सदा आँगन

तान मीठी सुना खुशी दे दे
बाँसुरी हाथ थाम आ मोहन

डाॅ. बिपिन पाण्डेय

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8 वर्ष पहले

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