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ऐ उम्र

                
                                                         
                            जन्मदिवस का अवसर,
                                                                 
                            
पाठ्यक्रम इक्कतीस—
अकस्मात् नज़र पड़ी,
पाठ का शीर्षक—
“उम्र”।

ऐ उम्र!
बीत रही है बिन पूछे,
तो बीतती जा...
ऐसे क्यों?
बढ़ती है
तो बढ़ती जा—
उपहार मुझे
मेरा देती जा।

लौटा दे मेरा बचपन,
लौटा दे पुराने खेल-खिलौने,
दादा-दादी का
ढेर-सा दुलार,
माँ-पापा की उँगली,
जिसे थामकर
चलना सीखा।

लौटा दे
झोली में रखी
तख्ती मेरी लौटा दे,
थोड़ी-सी होगी
चॉक पड़ी...

ऐ उम्र!
बढ़ती है
तो बढ़ती जा,
उपहार मुझे
मेरा देती जा—
मेरा बचपन।

— गौरव बघेल
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2 hours ago

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