बेवफाओं की राजधानी में,
यहां की हवाएं भी बेवफा हो गई है,
बेशकीमती समझकर,
तुम मुझे इतना भी न चाहो,
कि मैं अपनी पहचान भूल जाऊं,
और तेरे मेरे नाम का कोई,
कोई फतवा न निकाल दे,
यह दुनिया बड़ी ज़ालिम है यार,
मेरी मुस्कान को,
मेरी पहचान ही रहने दो
-धर्म नाथ चौबे मधुकर
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