बालपन के कुछ घरौंदे संग संग बनाये
साथ खेले तोड़ कर फिर सब चल दिये
गांव की पगडंडियों पर खूब दौड़े आगे पीछे
कदम जिनके तेज थे, शहर को निकल गये.
घर बनाये फिर सजाये परिजनों को साथ ले
सब विलासी हो गये और वे कंगूरे चढ़ गये.
कुछ शिखर पर बैठकर हमको चिढ़ाते ही रहे
और मालाएँ पहन कुछ जलवा दिखाते रह गये.
आज जीवन के सफ़र में रास्ते सब लौट आये
चार कंधों पर लदे संग छोड़कर सब चल दिये.
बालपन के सब घरौंदे आज फिर से मिल गये
साथ खेले तोड़कर जिनको कभी थे चल दिये.
- दिनेश चौहान
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