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अक्टूबर में क्या दर्द

                
                                                         
                            बिखराव का मौसम है अक्टूबर
                                                                 
                            
संभव हो तो संभाल लेना खुद को

संभाल लेना खुद को, क्योंकि...
कोई तुम्हारे लिए नहीं आएगा,
कोई तुम्हारी व्यथा नहीं समझेगा
इसमें पत्ते भी पेड़ का साथ छोड़ देते हैं
वर्षा भी आसमान का साथ छोड़ देती है
अक्टूबर में मौसम भी साथ नहीं देता
संभव हो तो खुद को संभाल लेना...

अक्टूबर है कि एक मनहूस-सा महीना,
ठंड आती नहीं और उमस जाती नहीं
न जाने क्यों अक्टूबर में घुटन बहुत है
अंधेरे कमरे के कोने में सिसकियां बहुत हैं
'अक्टूबर जंक्शन' पर सुधीर-चित्रा बिछड़े
अक्टूबर में ही बड़े-बड़े सूरमा ढहे

इन दिनों सूरज भी जल्दी मुंह फेर लेता है,
सांझ भी चुपचाप आकर मातम बुन लेती है
ज़िंदगी ठिठककर पानी-सी लगती है
हर ख़ामोशी में अपनी चीखें सुनाई देती हैं
उम्मीद की कोई आख़िरी डोर थामे रखना
अगर संभव हो तो खुद को संभाल लेना...

बिखरना इस महीने का पुराना दस्तूर है
संभाल लेना खुद को, बात कुछ दिनों की है
नवंबर की पहली धूप ज़्यादा दूर नहीं है
संभाल लेना खुद को, तुम्हारा कोई कसूर नहीं है।।
-दिलीप मिश्रा
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2 घंटे पहले

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