प्रकृति का रौद्र रूप देख
बेबसी का आलम छाया है,
किसी ने अपनी उम्मीदें खो दीं,
किसी ने संघर्ष को अपनाया है।
मेघ रिमझिम-रिमझिम बरसते हुए
धरती का आँचल भिगो रही हैं,
नदियाँ अपनी सीमाएँ लाँघकर
कहर बरसा रही हैं।
कहीं डूबे हैं घर, कहीं टूटे हैं सपने,
फिर भी आशा की किरणें
हौसलों को नई दिशा दे रही हैं।
एक ओर कुदरत का कहर है,
दूजी ओर किसानों का सवेरा है,
कुदरत की इस दोहरी तस्वीर को
आखिर कौन समझ पाया है?
जहाँ जल जीवन है,
वहीं जल सैलाब बन बैठा है।
-दीक्षा कुमरे
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