था अंधेरा तो अब तक मेरी राह में
आज दीपक आप जला ही दिए ,
दूर मंजिल थी पास राह नहीं
आज राह भी आप दिखा ही दिए ,
अब आंधियों में भी न बुझे चिराग मेरा
मेरी लौ को बस इतना बढ़ा दीजिये .
नित चरणों मे आपके वंदन करूं
सबसे पहले गुरु अभिनंदन करूं,
है दामन से चिपकी उदासी मेरे
कुछ तो खुशियों से परिचय करा दीजिये .
है दुनिया में कही तालीम नहीं
बस मजहब, सियासत, फरेबात है
आज अंधेरे में डूबा ये संसार है
जरा सूरज को जल्दी जगा दीजिये..
था अंधेरा.............।
हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X