भोर की उजली छटा बिखरी,
पूरब में लालिमा निखरी।
कली-कली किरणों से खिली,
निशा शरमा अपने घर चली।
पुष्पों से सारा वन महका,
डाली पर पंछी मधुर चहका।
तंद्रा त्याग मृग वन विचरें,
उलूक निद्राश्रय खोजें फिरें।
धन्य सूर्यदेव! ऊर्जा-स्रोत,
आपसे जीवन पाए ज्योत।
आपका तेज जीवन-आधार,
आपसे जग प्रकाशित अपार।
नित्य भोर, अश्व-रथ पर सवार,
सूर्यदेव आते धरा के द्वार।
अपना तेज लुटाते जग पर,
जीवन करते सदा उजागर।
-देवेंद्र भण्डारी
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