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मुकम्मल हरेक ख़्वाब हुआ

                
                                                         
                            रुख़े-रौशन जो बेनक़ाब हुआ,
                                                                 
                            
तो मद्धम जैसे माहताब हुआ।

तुम को पाया तो हर ख़ुशी पाई,
और मुकम्मल हरेक ख़्वाब हुआ।

ग़ुमाँ होता है मुझ को ख़ुद पर ही,
कि मैं तुम्हारा इंतिख़ाब हुआ।

मेरी बातों से तुम ख़फ़ा जो हुए,
तो ये चेहरा सुर्ख़ गुलाब हुआ।

तुम्हीं से ही है रौनक-ओ-रानाई,
और मंज़र बहुत नायाब हुआ।

तुम्हारे हुस्न का दीदार किया,
ख़ाना-ए-दिल मेरा ख़राब हुआ।

तुम मिले तो मिला सवाब मुझे,
"शमीम" जीना कामयाब हुआ।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
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45 मिनट पहले

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