मेरी ग़ज़ल
कब तलक़ आंसू बहाएं
कब तलक़ मातम मनाएं
इक तराना आज कोई
इश्क़ का हम गुनगुनाएं
आ मिलो जो तुम कहीं फिर
सौ ग़मों को भूल जाएं
ज़ख्म दिल के सालते अब
आज तो मरहम लगाएं
साज ना सुर ताल सरगम
महफिलें कैसे सजाएं
तुम नहीं तो हम नहीं हम
हम से हम कैसे मिलाएं
साथ अब तो छोड़ती हैं
धड़कनों की ये सदाएं
ज़िंदग़ी से तो निभा ली
मौत से यारी निभाएं
रो रहीं आंखें हमारी
"बावरी"हमको रुलाएं
दीक्षा द्विवेदी सारस्वत "बावरी"
आगरा ,उत्तर प्रदेश
हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
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