विषय धवल चांदनी
धवल चांदनी जैसे जैसे मुस्कराई,
रजनी सज-धजकर कर तब आई।
बोला चांद रजनी से तब ख़ुश होकर,
मैने तुमसे कब से है यह प्रीत सजाई।।
रजनी थोड़ी शरमा कर यूं बोली,
मैंने भी जन्मों है तुझसे प्रीत लगाई।
आओ पूर्ण चांद अब हम विहार करें
प्रकृति में थोड़ा सा हम श्रंगार भरें।।
नन्हीं नन्हीं सी ओस की बूंदों में तुम,
थोड़ा थोड़ा सा अमृत बरसा देना।
जो भी पान करें इन अमृत बूंदों का,
उसके जीवन में खुशियां ला देना।।
जब जब तुम आओगे पूर्ण रूप में,
मैं भी सज-धजकर फिर आऊंगी।
जितना प्रेम तुम मुझसे करते हो,
उससे ज्यादा प्रेम मैं भी दिखाऊंगी।।
यही चक्र सदा चलता रहा हमारा
हम तुम इक दूजे बिन रहे अधूरे हैं।
प्रिया और पिया मिलन का संगम है,
शरद पूर्णिमा को होते सपने पूरे हैं।।
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