चार बज गए काफी याद आई,
नमकीन के संग चीनी याद आई।
थोड़ी सुस्ती थोड़ी मस्ती थोड़ी हरकत
थोड़ी सी चेहरे पर मुस्कान छाई।।
चलें अब खेलें कूदें घड़ी ने सूई दिखाई
आफिस की चैं चैं मैं मैं से ली विदाई।
चाय की प्यारी सी चुस्की की याद आई
चार बज गए मन ने ली थोड़ी सी अंगड़ाई।।
चार बजे का रहता सबको इंतजार
कैसे करें चाय का हम प्यारा इजहार।
इन होंठों की सुस्ती को चाय का इंतजार
चलें अब चार बजे कर लें उनका दीदार।।
थोड़ा सा आराम करें कुछ विश्राम करें
सवाल पूछ पूछ सबका जीना हराम करें।
मन थका थका सा कह रहा है अब
चार बज गए चलों थोड़ा सा विश्राम करें।।
गर्म चाय कर रही अब टेबल पर इंतजार
कैसे करें इस चाय से हम कभी इनकार।
होठों की सुस्ती कह रही चल घूम आ यार
नहीं दिखती इस आफिस में जीवन सार।।
-चन्द्र शेखर मार्कंडेय
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