आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

इश्क नया अंदाज़

                
                                                         
                            जो दिल में बसे थे आज वो मजबूर हो गए है
                                                                 
                            
कितने वो पास हो कर भी दूर हो गए है
ये जिंदगी हमारी उन्हीं की दी हुई है
पर पा कर इसे हम कितने मगरूर हो गए है
क्या दौर है कि काँटों को कोई पूछता नहीं है
जिनकी चुभन के कारण फूल मशहूर हो गए है
जब कुछ नहीं थे सोचा थे उनके लिए कुछ करेंगे
कुछ होने पर अब सब वो खयालात काफ़ुर हो गए है
जाने किस घड़ी मे दिलों को दर्पण का खिताब दे डाला
इंकार पर उनके दिल ये गिरकर चूर चूर हो गए है
दिल के लिए जिस किसी से पूछा औरों का हो चुका था
अब मेरे लिए हसीनों के दिल कोहिनूर हो गए है
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
9 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर