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रफ्तार

                
                                                         
                            रफ्तार
                                                                 
                            

अभी तो शुरुआत है, रफ्तार बाकी है,
करने को मुलाकात मीलें दो-चार बाकी है।

मात मिले ग़र मोहब्ब्त में तो कुबूल नहीं,
परबत के उस पार एक संसार बाकी है।

कौन कहता है कि मंज़िल आसाँ नहीं,
अभी तो इन पैरों में वो झनकार बाकी है।

हर वक्त जेहन से होकर गुजरता है ख्याल,
गिरा दूँ उसे जो हमारे बीच दीवार बाकी है।

हाथ कातिल का गिरेबाँ तक पहुँचे भी कैसे,
अभी तो म्यान में एक तलवार बाकी है।

तब तक मुश्किल है, हमें मात दे पाना *बल*,
जब तक उन आँखों में प्रेम के तार बाकी हैं।

- बल्लू-बल 

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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5 वर्ष पहले

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