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सुनहरे सपनों पर,वही स्वामित्व।

                
                                                         
                            यूंही भटकते जिंदगी की भूली बिसरी गलियों में,
                                                                 
                            
खुद को पाया मैंने धुंधली यादों की देहरियों में।
सूनसान राह थी, था घनघोर अंधियारा
कोई जुगनू था, ना कोई टिमटिमाता तारा,
ना लालिमा थी भोर की, ना दिन का उजियारा।
बस सामने थी कष्टों की लंबी कतार
बस जीवन में दुश्वारियों की हाहाकार।
अंतिम सांस लेते मेरे सुनहरे सपने
छिन छिन दूर होते मेरे बहुतेरे अपने।
ना सर पर था आशीषों का नर्म आंचल
ना थी खनकती चूड़ियां ना रुनझुन पायल।
सब संभल जाएगा, कहने वाली कोई बातें
ना थी पिता की नेह भरी वो बोलती आंखें।
सिर्फ संग था कुछ भी कर जाने का जुनून,
फड़कती बाहें संघर्षों संकल्पों वाला खून।
फिर ना रोक सकी संघर्षो की संकरी राहें
ना कोई बोझिल कदम ना धुंधली निगाहें।
पाने को आतुर फिर वही प्रभुत्व
सुनहरे सपनों पर,वही स्वामित्व।
फिर हिम्मत के आगे नतमस्तक द्वंद
फिर पिघल गया संघर्षों का हिमखंड।
-बीना राजन मिश्रा
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13 घंटे पहले

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