मेरी कामयाबी से क्यों जलता रहता है?
मुझसे हरदम क्यों तू खफ़ा-खफ़ा रहता है?
जब मैं राहों में भटक रहा था, हँसता था,
मेरी हर नाकामी पर तू नाचता था।
सुबह-सवेरे ताने देकर मुझको छलता,
दिन-रातों में मेरे मन को घायल करता।
लेकिन मैंने ज़िद ठानी थी, हार न मानूँ,
अपने मन के सपनों को मैं सच कर जानूँ।
नींद न आती, ख़्वाबों में ही जीता था,
अपमानों का कड़वा घूँट भी पीता था।
ज्ञान बाँटता वो भी मुझको,
कुछ न जाने, ख़ुद को ज्ञानी समझे,
जग के भेद बखाने।
अपने शहर में मस्त चला, विश्वास लिए,
लोगों ने चाहा, बन जाऊँ मैं जोकर-सा।
गिरा नहीं मैं, लाख मुसीबत आने पर,
दिल की सुनी, बढ़ता गया मैं ठोकर खाकर।
आज सफलता देख मेरी क्यों जलता है?
कल जो हँसता था, आज क्यों चुप रहता है?
-भुनेश्वर अनंत
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X