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ऐ परिंदे ! उड़ना सीख लिया

                
                                                         
                            ऐ आसमान के परिंदे, हमने उड़ना सीख लिया है,
                                                                 
                            
इन हसीन वादियों में हमने जीना सीख लिया है।

खुद से बातें करके, खुद में खोना सीख लिया है,
ज़माने के संग, ज़माने के रंग में रंगना सीख लिया है।

रोना-धोना छोड़कर हमने हँसना सीख लिया है,
कहने वाले कहते रहे, हमने अनसुना करना सीख लिया है।

तेरे बिना जुदाई का ग़म हमने पीना सीख लिया है,
चेहरे के पीछे छिपे चेहरों को पहचानना सीख लिया है।

मुहब्बत में भी शान से रहना सीख लिया है,
राहत के आगे नहीं, रब के आगे शीश झुकाना सीख लिया है।

दोस्तों की महफ़िल में गप लड़ाना छोड़ दिया है,
अब तो अपनी कलम से एक नई दुनिया बसाना सीख लिया है।

कभी जो डरते थे आसमान की ऊँचाइयों से,
आज उन्हीं ऊँचाइयों को छूना सीख लिया है।

ऐ परिंदे, अब पिंजरे में रहना नहीं,
हमने खुले आसमान में उड़ना सीख लिया है।
-भुनेश्वर अनंत
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
10 घंटे पहले

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