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पटाखो पर रोक

                
                                                         
                            दिवाली से पटाखे छीन लो,
                                                                 
                            
छीन लो होली से रंग और गुलाल,
मूर्ती विसर्जन मे डालो अड़चन ,
लगाओ बंदिशे जितनी हो दिल मे मलाल,
संक्रांति की पतंग से माँझा छीन लो ,
लगाकर एंटी रोमियो हीर का रांझा छीन लो,
रोक लगाओ दशहरा मे रावण जलाने से,
एक-एक कर मिटा दो रस्मो-रिवाज जमाने से,
साल भर क्यों नही आदेश आता धूंये पर,
क्यों कानो मे जूं नही रेंगती जब
शराब पिने का इल्जाम लग जाता है चूहे पर,
सबको विदेशी रीति भा रही है ,
तभी अंग्रेजी हिंदी को खा रही है,
माना पटाखो से धूंआ फैलता है,
मगर यही बच्चो को त्योहार मे बांधे रखता है,
माफी चाहूंगा मगर बच्चो को दिलचस्पी
नही होती लक्ष्मी पूजन की,
होता है आक्रोश जब अपने ही देश मे
अनुमति नही मिलती मूर्ती विसर्जन की,
साल भर नदी मे जहर घुलने से
रोकता नही कोइ,
धूंआ उड़ाते है वाहन और फैक्टरिया
मगर टोकता नही कोइ,
निकल जाते है लोग थूककर दिवारो पर,
मगर गाज गिरती है तो सिर्फ त्योहारो पर,
हम हिंदुस्तानी नही कहलाते विदेशी विचारो से,
विश्व भर मे हमारी पहचान है त्योहारो से...
8 वर्ष पहले

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