तेरी वफ़ा की बातों में बाक़ी असर नहीं।
तेरे लिए कटे जो, वो मेरा सर नहीं!
पत्थर पे दिल को अपने सँभाले हुए हूँ मैं,
दुनिया के हर सितम का मुझे अब असर नहीं!
दुनिया के तख़्त-ताज की ख़्वाहिश नहीं मुझे,
अपने लहू से बढ़ कर कोई हुनर नहीं!
मैं अपनी ही अना का मुहाफ़िज़ हूँ ऐ जहाँ,
झुक जाऊँ हर किसी पे, मैं वो संग-ए-दर नहीं!
दुनिया को जीतने का हुनर था बहुत मगर,
अपनों के वार सह सके, इतना जिगर नहीं!
तलवार खींच ली है तो अंजाम देखना,
ये जंग है अना की, यहाँ कोई डर नहीं!
साहिल पे बैठकर जो दिलासा हज़ार दे,
तूफ़ाँ में साथ दे सके, वो हमसफ़र नहीं!
मैंने तो सच के वास्ते सब कुछ लुटा दिया,
झूठी किसी भी जीत की मुझको ख़बर नहीं!
दुनिया के डर से रास्ता अपना बदल लूँ मैं,
'अज़हर', मिरे मिज़ाज में ऐसा हुनर नहीं!
- अज़हर साबरी
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