हसीना ज़हीन हो तो उसके कदमों में जहान झुकता है
गुलफाम से चेहरे का हुस्न शबनम का काम करता है
माहताब भी चमक बटोरे खूब सीरती से,
हुस्न शोख आंखों का,अक्स ए कमर का काम करता है
चमक गेसुओं की बन जाएं बदलियां
जानिब ऐ पाकीज़गी ,कोई झुक कर सलाम करता है
लब ए गुलरंग की तबस्सुम सुर्ख रुह करे
नज़ाकत ए हुसन सरताज , जब शीरीन कलाम होता है।
जमाल ए बातिन हुस्न को दिलकश करे
"अश्क " जब रूहानी एहसासात कत्लेआम करता है।
- अश्विंदर बावा "अश्क"
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