बड़ी घुटन सी है दिल में
कोई राब्ता निकले
दिल-ए-दर्द बयां करने का
कोई रास्ता निकले।
बेक़रार सी है रातें दिन
बेतरतीब हो चली
दिल का सुकून से कोई तो
कभी वास्ता निकले।
कभी ख़्वाबों के गलीचे कभी
कांटों पे है बसेरा
मोहब्बत में तो हर घड़ी कोई
दास्तां निकले।
शामे-ए-तन्हाई मेरी गुज़री जो
सपनों के शहर से
होंठों से एक आह सी
बेख़ास्ता निकले।
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