हाँ, सारा दोष उसी का था,
यह बात बिल्कुल साफ़ है,
इस पाक-साफ़ समाज का,
हर एक गुनाह माफ़ है।
शायद वो नन्हीं सी कली,
जो तीन महीने की पली,
झूले में अपने ढंग से सोना नहीं जानती थी,
कपड़ों का छोटा दायरा पहचानना नहीं जानती थी।
जब दरिंदगी की प्यास
उस मासूम जिस्म से न बुझी,
तो चीर कर रख दी देह,
न रूह तक उसकी बची।
पर कसूर उस बच्ची का ही था,
वो ज़रा संभल के सोई न थी,
चीख भी न सकी दर्द से,
शायद कायदे से रोई न थी!
और एक सौ दो साल की,
वो थरथराती बूढ़ी जान,
जिसकी झुकी कमर को भी,
नोच गया कोई हैवान।
सफेद कफ़न सी साड़ी में भी,
हवस का साया गहरा गया,
ज़रूर उस झुर्रियों वाली मां का ही,
चरित्र डगमगा गया !
दरिंदा तो लाचार था,
नियत तो उसकी साफ़ थी,
बुढ़िया की सफेद चादर में ही,
कोई बात ख़राब थी!
हर दस में से नौ बेटियों को,
छूती गंदी निगाहें हैं,
दफ़्तर, गली और बस में भी, ज़हरीली हर राहें हैं।
और सर उठा कर जो चली,
तो रूप उसका जला दिया,
चंद रुपयों के तेज़ाब से,
पूरा वजूद गला दिया।
फिर भीड़ ने कह दिया,
"अरे तेवर ही उसके भारी से थे,
लड़की को झुक के रहना था,
सब नख़रे उस नारी के थे।"
उम्र भर का ख़ौफ़ मिला,
तिल-तिल कर वो घुटती रही,
अदालतों की तारीख़ों में,
उसकी इज़्ज़त लुटती रही।
वहशी को मिली चंद साल में छूट, वो सीना तान के घूमेगा,
और जिस का सब कुछ जल गया, वो साया देख के कांपेगा !
क्या यही तुम्हारा न्याय है?
क्या तराज़ू तुम्हारा अंधा है?
अंधा नहीं, शायद कानून तुम्हारा अब नपुंसक हो चुका गंदा है!
या रूह बेचने वाले हुक्मरानों का ये सबसे घटिया धंधा है?
तुम कहते हो—
"सूरज ढलने के बाद बेटियाँ
चौखट लांघ न पाएँ,
लक्ष्मण रेखा में कैद रहें,
अपनी हदों में सिमट के आएँ।"
तो फिर उस पावन रात में,
जब नौ दिन का त्योहार मने,
सड़कों पर जब रात-रात भर,
ढोल-नगाड़े और शोर बने,
क्या अंधेरा होते ही दुर्गा को भी, ताले में बंद कराते हो?
या अपनी मर्दानगी छुपाने,
पर्दे उस पर भी खिंचवाते हो?
पत्थर की उस मूरत के आगे,
रात भर शीश झुकाते हो,
और बाहर निकलकर जिंदा देवी,
को नोच-नोच कर खाते हो!
बस बहुत हुआ!
मोमबत्तियों के तमाशे से अब कोई हल नहीं निकलेगा,
इन सुलगते हुए अंगारों से,
तुम्हारा हर झूठा पाखंड पिघलेगा।
अदालत के खोखले काग़ज़ों को,
अब आग में झोंकना होगा,
हैवानियत के हर एक जबड़े को, चौराहे पर टोकना होगा।
दोष कपड़ों का मढ़ने वाले भेड़ियों, अपनी आँखें खोल लो,
गंदगी किसी के जिस्म में नहीं, अपनी नपुंसक ज़हनियत को तोल लो!
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