मुझे वह लड़की दिखती है,
जो पर्दे के पीछे से झाँकती रहती है।
सूरज निकलने से लेकर
अँधेरा होने तक
वही खड़ी रहती है।
वह इंतज़ार करती है
कि कोई आएगा पल भर के लिए,
और रोशनी उस दरवाज़े से
भीतर चली आएगी।
वह बचे हुए समय में
घर के कोनों को नापती है,
सामान को
उसकी आकृति से पहचानती है।
शायद उसकी हिम्मत बस इतनी है—
कि वह रोज़ रात
अपने बिस्तर के बगल वाली खिड़की से
तारों को देखती है।
एक रात
उसने तारों को गिनना छोड़ दिया,
और खिड़की के बाहर की
दूरी नापने लगी।
अब भी उसे
कुछ बेड़ियाँ-सी महसूस होती थीं—
अपनी झिझक की,
अपने विचारों की।
वह जब भी
अपने आसपास के लोगों को
गिरता हुआ देखती थी,
खुद को थोड़ा थका हुआ महसूस करती थी।
शायद...
नहीं,
परंतु...
वाले सवालों से घिरी रहती थी।
एक सवाल
जो समाज उसके सामने रख रहा था,
और दूसरा
जो वह खुद के लिए
चुन रही थी।
समाज उसे
अपने दायरों में रखना चाहता था,
उसका नाम
उसे भूल जाने के लिए कहता था।
तब एक दिन
वह दरवाज़ा खुला।
पहली बार
रोशनी के साथ-साथ
उसे अपना पूरा घर दिखाई दिया।
अब उस घर के
हर सामान का
अपना एक नाम था।
थोड़ा और ढूँढने पर
उसे उसकी ही
कुछ और निशानियाँ मिलीं।
जो इतने बरसों से
वह इस घर में
छोड़ती आ रही थी—
वह भूरा दरवाज़ा,
वह सफ़ेद दीवारें।
उसके सजने-सँवरने की भी
एक अलमारी थी,
एक पुरानी डायरी,
जिसमें उसके ही
कुछ शब्द थे।
वह फिर रसोईघर में गई
और अपने लिए
एक चाय बनाई।
फिर उसी कमरे में आकर
वह एक कुर्सी पर बैठ गई।
चाय की भाप के बीच
वह कुछ उधेड़बुन कर रही थी,
और एक हाथ से
उस डायरी के पन्ने पलट रही थी।
तभी
उसके चेहरे पर
एक हल्की-सी मुस्कान आई।
उसने कलम हाथ में उठाई
और डायरी के आख़िरी पन्ने पर
लिख दिया—
“जीवन की नई शुरुआत मुबारक हो।”
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