तुरबत में मेरे इश्क़ का अरमां कही नहीं,
दिखाया मुझे आइना जब जां बची नहीं,
फर्श कर दी निगाहे तेरी जलवागाह में,
इंतज़ार है शब्-ए-फ़िराक में, फुर्सत उन्हें नहीं।
लिया इन्तहा वक़्त ने रोज़-ए-सजा पे यु,
सजाया मेरा जनाजा पर तुरबत कही नहीं।
बयां होते नहीं राज-ए-तकसीर अपनी जुबा से आज,
अब अफ़सोस ही है मेरे दिल में नफरत कही नहीं।
पशेमां इस तक़दीर को रक़ीबा समझ के "आशिक़",
तह-ए-ख़ाक हुआ तो सुकून-ए-जां मिली नहीं।
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