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मेरी चाहतो का कभी ऐसा ज़माना था

                
                                                         
                            मेरी चाहतो का कभी ऐसा ज़माना था,
                                                                 
                            
सुकून जिगर में लबो पे नया तराना था,
शाम से पीते रहे जिस मयखाने में हम,
सहर तक वहां न मय थी और न मयखाना था।

मचलना उनका मिलने के लिए मुझसे,
बा-रोज़ हम सुनते थे उनके किस्से नए नए,
निशाना बने होंगे उनका बेबस न जाने कितने,
फिर मुझे कैसे बचे रह जाना था।

मुस्कुराने लगे वो मेरे क़त्ल हो जाने के बाद,
फ़ना हुए वादे, जल गयी वफ़ा की किताब,
हमें राख करके बन गए वो आफताब,
रुखसत होकर उन्हें एक गैर के संग जाना था।

कसक उनकी है इस दिल में आज भी,
चुभन बरक़रार है मेरी साँसों में आज भी,
रूह भी खामोश है मेरी और सांस भी,
अज़ल "आशिक़" की थी ज़ख्म फ़क्त बहाना था।
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6 घंटे पहले

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