इतिहासों की गौरवशाली , सब गाथाएँ याद करो |
लक्ष्मीबाई, दुर्गाभाभी , जीजाबाई याद करो |
याद करो एक एक घटना , कालखण्ड खंगालो जी |
हुये धरा के खातिर जितने , जन्म मरण लिख डालो जी |
मान बड़ा है, यहाँ जान से , खुद को होम किया जाता |
ये वो पावन माटी जिसको , माँ का नाम दिया जाता |
हैं वीर नारियाँ भारत की , जान भले जाने देंगी |
लेकिन अपनी आन बान पर , आँच नहीं आने देंगी |
आज सुनो वह घटना जिसनें , मन का तार हिलाया है |
बलिदानों की परिपाटी में ,स्वर्णिम नाम लिखाया है |
नाम पद्मिनी रानी उसका , देव धरा से आई थी |
शायद बरसो के तप से, इतनी सुंदरता पाई थी |
सारे सांचे सुन्दरता के ,उसके खेल खिलौने थे |
और महल उपमानों के भी, उसके सम्मुख बौने थे |
उसके तन की आभा ऐसी , चांदी फीकी पड़ती थी |
जब रति देखती यह स्वर्ग से , मन ही मन में चिढ़ती थी |
सोलह चन्द्र कलाएँ उसके , सम्मुख ही नतमस्तक थीं |
लेकिन चर्चा यही रूप की , अनहोनी की दस्तक थी |
तब देवदुर्लभ सौंदर्य से , दिल्ली का मन डोला था |
फिर आतातायी खिलजी ने , छल से धावा बोला था |
हथियारों से सज्जित सेना , अनगिन हाथी घोड़े थे |
इज़्ज़त स्वाभिमान के सम्मुख , खिलजी सैनिक थोड़े थे |
घेर लिया था दुर्ग दुष्ट ने , बस रानी को पाना था |
केवल दर्पण प्रतिबिम्ब देख , खिलजी हुआ दिवाना था |
दुष्ट नीचता से रावण ज्यों , सिया हरण को निकला था |
बदनीयत होकर खिलजी नें , अंदर का विष उगला था |
रस्ता शेष दिखा ना कोई , अपना मान बचाने का |
निर्णय लिया कठिन रानी ने , जौहर में जल जाने का |
सोलह हजार जली चिताएँ , ऐसे लाज बचाई थी |
हँसते हँसते खुद ही सबने , अपनी चिता सजाई थी |
ज्यों देख सती को अग्नि मध्य , शिव ने आपा खोया था |
ऐसा जौहर देख विधाता , फूट फूटकर रोया था |
सारे वैभव बौने ऊँचा , सम्मानों से जीना था |
भेद नहीं पाया वह बैरी , हिन्दुस्तानी सीना था |
दुष्ट अलाऊ जीत ना पाया , नारी के स्वाभिमान को |
और चला वह मूर्ख जीतने , समूचे हिन्दुस्तान को |
-:- अंकित विशेष
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