मेरे मन में जल रही एक क्रांति की ज्वाला
एक ओज,एक विद्रोह,एक विरोध की ज्वाला
धधक रही है आग आज अवनी और अंबर में
मन करता है लगा दूं आग आज समंदर में
मैं अंगार का कवि
मैं ललकार का कवि
मैं हुंकार का कवि
मैं टंकार का कवि
मैं क्या तन प्यार लिखूं?
मैं तो स्वदेश प्यार लिखूं
मैं तो सारा संसार प्यार लिखूं
मैं तो जनता की पुकार लिखूं।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'
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