असर है ये किसी की
नसीहत ओ गुमान का
कि लहजा ही बदल
गया है तेरी ज़ुबान का।
मैं खामोश किसी डर
या खौफ से नही हुआ
पहले से ही कायल नहीं
था तेरी ज़ुबान का
हम तो ख़ामोश रह कर
भी सब जान लेते हैं
कि हुनर आता है हमें
नज़रो की दास्तान का।
बदलते हुए वक़्त का
शिकवा ही क्या करें
फितरत से ही न हो जो
दीन ओ ईमान का
भरम मिट ही जाता है
एक न एक दिन ऐ 'अदा'
अयाँ हो ही जाता है सच
हर इंसान का।
-अनिता दासानी'अदा'
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