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आहट की प्रतीक्षा

                
                                                         
                            आहट की प्रतीक्षा —
                                                                 
                            

पंथ निहारी थकी अँखियाँ,
साँझ हुई, फिर रात हुई,
द्वार खड़ा मन पूछ रहा है—
कब पूरी वह बात हुई?

आहट कितनी सुनती हूँ मैं,
हर आहट में तुम लगते हो,
सूनी राहों के सन्नाटे
चुपके-चुपके कुछ कहते हैं।

दीप जला है देहरी पर,
पर मन में अँधियारा है,
जिसे पुकारा उम्र भर मैंने,
वही आज भी क्यों किनारा है?

न जाने किस मोड़ पर आकर
रुक गई मेरी जीवन-गाथा,
शब्द सभी अधरों पर ठहरे,
मौन बना मन का हर नाता।

तुम आते तो शायद फिर से
रंग भरते इन आँखों में,
सूखे सावन गीत सुनाते
मेरी सूनी साँसों में।

पर प्रतीक्षा भी प्रेम ही है—
यह मन आज समझ पाया,
मिलन मिले या विरह मिले,
मैंने तुमको ही अपनाया।

पंथ निहारी थकी अँखियाँ,
फिर भी आशा मरी नहीं,
अधूरी पंक्ति कहती है—
प्रेम की कहानी पूरी नहीं...

© अनिता चतुर्वेदी ‘मनस्वरा’
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
12 घंटे पहले

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