मिज़ाज बदलने की आदत है तुझे ऐ ज़िन्दगी,
पर मेरे भी मिज़ाज कुछ तल्ख़ रहे हैं।
तूने बदलने की कोशिश तो बहुत की मुझे,
मगर मेरे इरादे ज़रा सख्त रहे हैं।
तू आज़माती रही उम्र भर ठोकरों से मुझे,
पर हम भी अपनी धुन में अलमस्त रहे हैं।
तूने हर मोड़ पर रास्ता रोका मेरा,
मगर हम चट्टान की तरह दरख्त रहे हैं।
तेरा हर इम्तिहां गवाह है इस बात का,
तू आजमाती रही, हम अपनी ज़िद पर पुख्त रहे हैं।
वक्त की ठोकर भी तोड़ ना सकी मेरे हौसले को,
तू गिराती रही, और हम उठ उठकर मस्त रहे हैं।
-अनिला विर्णवे
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