दिन गुजरते रहे,उम्र बढ़ती रही
धूप घटती रही,गर्द उड़ती रही
वो करीब आ के मेरे ठहर सा गया
डूबता मैं रहा,सांस थमती रही
मैं चला था,रब के ही जानिब मगर
मैं भटकता रहा ,आँख छलती रही
इक हवा फूल छू कर गुजरती रही
एक ख्वाबों की दुनिया महकती रही
टिमटिमाता दिया,खौफ से बुझ गया
आँधियां जब्त खुद को यूं करती रहीं
एक दुनिया अलग है जो मेरी ही है
ऐसा अंदाजा दुनिया लगाती रही
मैं जहां पर खड़ा,था चला आया तो
जाने क्या चांदनी, ढूंढती रह गई
वाकया रोज होता है इस बाग में
हँसते कांटे रहे, कलियाँ रोती रही
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