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बीच में दीवार खड़ी

                
                                                         
                            बीच में खड़ी यह दीवार,
                                                                 
                            
कोई रोक नहीं—एक पहचान है,
कल तक जिसका कोई दायरा न था,
आज वही अपनी सुरक्षा का प्रमाण है।
गलत नहीं है यह दीवार,
यह तो हक़ की एक आवाज़ है,
जो अपने अस्तित्व को पहचान सके,
उसके लिए यह स्वाभिमान का राज़ है।
अब उस दीवार को कोसिए मत,
उसे सुंदर पोस्टरों से सजाइए,
अपनी सोच, अपने संदेशों से
उसकी हर ईंट को बोलना सिखाइए।
कल तक लोग बेझिझक
अपने घर का कूड़ा आपके आँगन में फेंक जाते थे,
आपकी सीमा, आपकी पीड़ा को
शायद समझना भी नहीं चाहते थे।
अब सीमा है—तो सुरक्षा भी है,
अब पहचान है—तो सम्मान भी है,
दूसरों के भरोसे मत बैठिए,
अपनी सुरक्षा का अधिकार भी आपके नाम है।
दीवार को कमजोरी मत समझिए,
यह आपके अस्तित्व की लकीर है।
इसे बाधा नहीं, अवसर बनाइए—
यही आपकी नई तस्वीर है।
आइए, इस दीवार पर ऐसे संदेश लिखें
जो हर आने-जाने वाले को समझाएँ—
“स्वच्छता मेरी जिम्मेदारी है,
सुरक्षा मेरा अधिकार है,
और अपने परिसर की रक्षा करना
हम सबका संस्कार है।”
जो कल तक अस्तित्वहीन था,
आज वही अपनी पहचान बना रहा है;
जो खुला था हर किसी के लिए,
आज अपने अधिकारों की सीमा बना रहा है।
दीवार खड़ी हुई है तो खड़ी रहने दीजिए,
इसे सुंदरता और संदेश का आधार बनाइए।
दायरा अपना स्वयं तय कीजिए,
और अपने अस्तित्व को गर्व से सजाइए।
क्योंकि—
सुरक्षित वही नहीं, जिसके चारों ओर दीवार है,
सुरक्षित वह है जो अपनी जिम्मेदारी समझता है।
और मजबूत वही समाज है,
जो अपनी सीमाओं का सम्मान करता है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
21 घंटे पहले

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