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सुखा वृक्ष

                
                                                         
                            खड़ा रहा वह मौन खड़ा,
                                                                 
                            
विगत स्मृतियों के घेरे में,
कभी यहाँ थी चहक परिंदों की,
अब सन्नाटा है सवेरे में।
न अब फूलों की खुशबू है,
न पत्तों की हरियाली है,
वक्त की आंधी ने छीन ली,
जो डाल-डाल पर लाली थी।
छाल उधड़ गई है तन की,
धूप सहता है वह नग्न खड़ा,
पर झुकना उसने सीखा नहीं,
संकल्प लिए वह अटल अड़ा।
जड़ें अभी भी गहरी हैं,
धरती के अंतर्मन में,
वह प्रतीक्षा करता है फिर से,
नव-जीवन के मधुबन में।
सीख दे रहा जग को वह,
पतझड़ ही अंतिम सत्य नहीं,
धैर्य अगर है भीतर तो,
फिर से खिलना कोई स्वप्न नहीं।
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7 महीने पहले

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