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पराक्रमी मच्छार

                
                                                         
                            कभी हुए थे यहाँ एक सरदार,
                                                                 
                            
नाम जिनका सुनते ही काँपे गद्दार।
इसीलिए भारत ने कभी न मानी हार,
क्योंकि पैदा होते रहते हैं स्मित मच्छार।

मानवीयता और पराक्रम देखा दुनिया ने,
किस हद तक जा सकते हैं गद्दार।
आज कहीं न कहीं मानवता होती शर्मसार,
यदि उस प्लेन एक पायलट न होते मच्छार।

सुना था कभी शिवि और दधीचि के बारे में,
पढ़ा था दुनिया ने जिसे कभी किताबों में।
उसे चरितार्थ कर दिया दृढ़ आधार,
कि वीर प्रसूता भारत में आए पराक्रमी मच्छार।

आओ अनन्त नमन करें उनकी जननी को,
उस पिता को जिनसे मिले ऐसे संस्कार।
कि स्वयं से पहले दूसरे की सुरक्षा दो सरकार,
अपने पराए को भूल चाहे मर मिट जाओ बारंबार।
-अनन्त राम त्रिपाठी ‘उमापुष्पांश’
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2 घंटे पहले

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