आओ मिलकर एक अहद उठाएँ
आओ मिलकर एक अहद उठाएँ,
इस दीवाली ऐसा दीप जलाएँ,
जिससे उदासियाँ भी मुस्कुराएँ।
सिर्फ़ घर-आँगन ही नहीं,
हमारी ज़िंदगी भी जगमगाएँ।
आओ मिलकर एक अहद उठाएँ...
माना, हर चेहरे पर एक मुखौटा है यहाँ,
मानो तो हर कोई अपना है यहाँ,
वरना हर शख़्स बेगाना है यहाँ।
जो ख़ुद से भी नाराज़ बैठा हो,
आओ, हम मिलकर उसे मनाएँ,
उसके मन के अँधेरों में भी
उम्मीद के दीप जलाएँ।
आओ मिलकर एक अहद उठाएँ...
माना, जेब से ग़रीब हैं यार,
लेकिन दिल से तो अमीर हैं यार।
जेब का ख़ाली होना कोई ग़म नहीं,
दिल का ख़ाली होना
किसी सितम से कम नहीं।
जेब से ख़ाली होकर भी
दिल का भरा होना ख़ुशक़िस्मती है,
सोच से ख़ाली रह जाना ही
इंसान की सबसे बड़ी ग़रीबी है।
आओ, जो खो गया है,
उसे फिर से पाएँ,
सोच की अँधेरी गलियों में प्यार,
विश्वास और सहयोग के दीप जलाएँ।
आओ मिलकर एक अहद उठाएँ...
एक से दो, दो से तीन
और तीन से चार,
ऐसे ही आगे बढ़ता है संसार।
इसी से बनते हैं रिश्ते,
इसी से सँवरते हैं संस्कार।
फिर क्यों इतना भेदभाव,
क्यों इतना ऊँचा अहंकार?
मैं यह हूँ, मैं वो हूँ,
वो फलाँ है, वो फलाँ है
इन दीवारों को तोड़कर क्यों न
हम एक नई राह बनाएँ?
अपनेपन की लौ से
हर दिल को रोशन बनाएँ।
अहंकार का यह दानव
धीरे-धीरे निगल रहा है हमको,
इस दीवाली एक-दूसरे का हाथ थामकर,
क्यों न इस ‘मैं’ और ‘तुम’ को
मिटाकर ‘हम’ बना जाएँ?
आओ मिलकर एक अहद उठाएँ!
इस दीवाली केवल दीप न जलाएँ,
किसी रूठे हुए को फिर से मनाएँ।
किसी की आँखों में उम्मीद सजाएँ,
किसी के सूने जीवन में ख़ुशियाँ लाएँ।
नफ़रत के अँधेरों को प्रेम से मिटाएँ,
टूटते रिश्तों को विश्वास से सजाएँ।
हर दिल में इंसानियत का दीप जलाएँ,
और मिलकर एक ऐसा संसार बनाएँ,
जहाँ हर चेहरा मुस्कुराए,
हर दिल अपनापन पाए।
आओ मिलकर एक अहद उठाएँ,
इस दीवाली इंसानियत का दीप जलाएँ!
— आचार्य अमित
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