जिसने अपने माधुर्य से मेरी रग–रग को भिगोया,
नैसर्गिक खुशबू बनकर हर सूने पल को सुलगाया।
जिसके होने भर के एहसास ने अर्थ दिया जीवन को,
हर हालत में जीना सिखाया, थामा मेरे मन को।
वह आई तो डर भी साहस का रूप बदलने लगा,
हर विपरीत घड़ी में मेरा हौसला सँभलने लगा।
आँधियों से लड़ना मैंने उसी से सीखा था,
टूटकर भी मुस्कराना उसी ने ही लिखा था।
पर एक दिन उसने अनायास बस इतना कहा,
“अगर हो सके तो लाओ, रात रानी का फूल ज़रा।”
न धन, न ताज, न चाँद–सितारे उसने चाहा,
सिर्फ़ एक सादा–सा फूल, प्रेम का संकेत माना।
अजीब विडंबना देखो, जो सब कुछ दे सकता था,
जिसके कारण मैं हर युद्ध जीत सकता था—
उसी क्षण मेरी झोली में शून्य उतर आया,
रात रानी का वह फूल भी मैं दे न पाया।
आज समझ आता है, प्रेम की यही परिभाषा है,
सब कुछ पाकर भी एक कमी की ही अभिलाषा है।
जो सबसे सरल होता है, वही सबसे भारी होता,
क्योंकि प्रेम में असमर्थ होना ही सबसे न्यारी होता।
अब हर रात रानी की खुशबू मुझे चुपचाप कहती है,
कि प्रेम का ऋण शब्दों से नहीं, मौन से बहती है।
मैं आज भी जी रहा हूँ उसके दिए साहस पर,
पर उस एक फूल की कमी है—मेरे पूरे जीवन पर।
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