दुनिया कोशिश कर कर के हारी
टूट न पायी अपनी खुद्दारी
नींद खफ़ा है मेरी आँखों से
"जब से सर आयी जिम्मेदारी "
आँखें होकर भी तो अंधी है
कितनी बदकिस्मत है गांधारी
बस मतलब के रिश्ते हैं सारे
देख चुके सबसे करके यारी
अपने ही बच्चों की कलयुग में
बन बैठी है इक माँ हत्यारी
माँग उठाई हक़ की औरत ने
फिर होगा कोई फतवा जारी
दूर गया है फिर कोई अपना
कल से तबियत है भारी भारी
भर देती है खुशियों से घर को
आँगन में बच्चे की किलकारी
जैसे भी हो भूल 'अहद' उसको
दिल पर रख ले तू पत्थर भारी !
✍अमित "अहद"✍
(सहारनपुर)
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