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नीति के दोहे मुक्तक

                
                                                         
                            पवन बिगड़ी बसंत की , करिये प्रातः सैर।
                                                                 
                            
शरीर होय वायु मुक्त , 'लाल' मनाये खैर।।

चुनाव आते फूटता , जातिवाद नासूर।
ध्रुवीकरण हो मतों का ,प्रयास हो भरपूर।।

कवि : अशर्फी लाल मिश्र , अकबरपुर ,कानपुर।

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6 वर्ष पहले

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