मौत तू मुझे पल-पल डराती है और फिर आती नहीं है,
तू कब आयेगी, मैं बार-बार पूछता, पर बताती नहीं है।
मैं सोचता हूं, जब तेरा कोई ठिकाना नहीं है,
तू कब आएगी, जब तुझे यह बताना नहीं है।
फिर मैं भला क्यों, खुद को तुझसे छुपाता रहूँ,
मरने के डर से, कब तक खुद को बचाता रहूँ।
मौत तू मुझे पल-पल डराती है और फिर आती नहीं है,
तू कब आयेगी, मैं बार-बार पूछता, पर बताती नहीं है।
नदी प्रवाह सी कलरव करती जीवन धारा है,
तेरे भय-स्वभाव से मानव का जीवन हारा है।
क्या मृत्यु के बाद, मेरा ये जीवन मिट जायेगा?
नहीं, यह अंधा मोड़ है, फिर प्रकट हो जायेगा।
मौत तू मुझे पल-पल डराती है और फिर आती नहीं है,
तू कब आयेगी, मैं बार-बार पूछता, पर बताती नहीं है।
ओ मौत! मैं तुझसे डरूंगा नहीं, न भयभीत होऊंगा,
तेरे स्वागत की तैयारी करूँगा, न व्यर्थ समय खोऊँगा।
करूँगा विपस्यना का अभ्यास और अंतर्दृष्टि होऊंगा,
चित्त-काया की संवेदनाएं, अनित्य बोध पर सोधूँगा।
मौत तू मुझे पल-पल डराती है और फिर आती नहीं है,
तू कब आयेगी, मैं बार-बार पूछता, पर बताती नहीं है।
न बनने देंगे भवचक्र जो चित्त पर भवकर्म प्रकट करे,
रहूंगा सजग-तटस्थ ऐसे, जो चित्त को समता से भरे।
वाणी-काया कर्म करूँ ऐसे, जिससे पुण्य-पाथेय मिले,
जग से जाऊँ ऐसे, जैसे एक जलते दीपक की लौ बुझे।
मौत तू मुझे पल-पल डराती है और फिर आती नहीं है,
तू कब आयेगी, मैं बार-बार पूछता, पर बताती नहीं है।…
– अजय शोभने.
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