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काव्य-शहीद-विधवा

Kavya Shahid Bidhwa
                
                                                         
                            शत शत नमन हे सरहद प्रहरी,कमा.डी.वत्स वीर,
                                                                 
                            
पति ने पायी वीरगति,मेजर कुमुद नहीं हुयी अधीर।
हाथों में नवजात लिये वीरांगना सैनिक वेश चली,
मर्दानी झांसी लक्ष्मीबाई ज्यूं,शत्रु दल से खूब लड़ी।
न थकन न शिकन, हां सूनापन माथा विन कुमकुुुम,
लेकिन फर्ज निभाने को बह न बिलखी और न टूटी।
तुम भी देखो देशहंताओ और फतवा के पैैरोकारो,
अपनो का खून बहाने बालो,भारत माता के गद्दारों।
ओवेसी महबूबा,फारुक देखो,देखो छदम पहरेदारों,
विंदिया पुछ गयी,सिंदूर हटा,पायलिया टूटी,चूड़ी टूटी।
न छूटा धैर्य,न पैर थके,चपल पग सजग शमशान बढ़े,
अहा ! गति की निष्ठुरता,चूूहों ने मां आचंल छेेेद किये। 
सच है घाव गम्भीर हुआ ,ना पाक ड़रा, न ढ़ेर हुआ,
बादियों के हसीन लम्हों का दीदार बहुत अधेड़ हुआ।
हे नमो ! तुरंत उपाय करो,नासूर घाव बनता लगता,
सरहद के बाहर से पहिले अदंर का भी इलाज करो।।
           
काव्य-वेदना         
अजय गुप्ता 'अजेय'

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8 वर्ष पहले

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