आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

हुकूमत

Hukumat
                
                                                         
                            इससे पहले तो यहां कोई...
                                                                 
                            
न रोने वाला था।
ये कैसी हुकूमत आई,
क्या कोई हंसाने वाला न था।
इससे पहले तो....,
मैं तन्हा ही अच्छा था।
तू क्यूं मुझे राह बताने आई,
क्या ये रास्ता मेरी मंजिल तक
जाने वाला न था।
आज जो कुछ भी हूं,
उसी की वजह से हूं।
वरना कौन था हमें रुलाने वाला।
हालात ये है कि...
कोई हमें पूछता तक नहीं,
आगे हाथ बढ़ाये...
कोई देखता तक नहीं।
बस इक मां ही है,
जो हर शहर पूछती है,
बेटा बता..वो कौन है तुझे रूलाने वाला।।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें। 

- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर